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हिडमा आदिवासी नायक नहीं, माओवादी मास्टरमाईंड था।

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विकास नागपुरे के सरेंडर होने पर उठ रहे सवालोका अनुचित बवंडर

 

जिस व्यक्तीने नक्षल मुव्हमेंटमे काम करते वक्त कई आदिवासी बंधूओको मार गिराया, पोलीस के हातो मारे जाने के बाद उसको आदिवासी नेता कह पुकारना, यह समुचे आदिवासी समाज का अपमान हैl
नक्सल कार्यकर्ता हिडमा के लिए रोने वाले यह तय कर लें, वे आदिवासी समाज के साथ हैं या उन माओवादियों के साथ जो आदिवासी बच्चों के हाथों में कलम की जगह बंदूके थमा रहे हैं । दुसरी और अनंत और उसके दस साथीदारोंके शरण आने के बाद जो चर्चाए माध्यम जगत में जानबुझकर फैलाई ल जा रही है, उसमे विकास ऊर्फ अनंतके हातो मारे गये एक पोलीस अधिकारी की चर्चा विशेष रूप से हो रही हैl ज्ञात हो कि, जब यह हत्या हुई थी, तब अनंत खुलेआम नक्सल समर्थक थाl उस वक्त अनंत और उसके साथी बंदूक ताने पोलीस के सामने खडे थेl इस स्थिति मे दोनो तरफ से गोलिया चलनेकी किसी की मौत होने की संभावना थीl उसका पुलीस के सामने सरेंडर होना यह सरकारने नक्सलीयो के लिए तयार की हुई योजना का भाग थाl किसी पोलीस अधिकारी के मारे जाने का केवल निषेध ही हो सकता है, परंतु नक्सलियोंके शरण आने की प्रक्रियापर उसका असर नही होना चाहियेl इस मुद्दे पर सरकार की ओर से की गई पहल की सराहनाही होनी चाहियेl निहित समय में नक्सल मुव्हमेंट खत्म करने का उद्देश सामने रखकर केंद्र एवं राज्य सरकार काम कर रही हैl या मुव्हमेंट समाप्त करना, मतलब केवल नक्सलियोंको जान से मारना यह सरकार का उद्देश नही है नाही हो सकता हैl कभी कबार नक्षल मुव्हमेंट का पार्ट रहे व्यक्तियों को समाज की मुख्य धारामे सम्मिलित करने की कठीण प्रक्रिया मे ऐसे बहुत सारे लोग होंगे, जिन्होने बंदुके तानकर पुलीस का सामना किया हो. मूठभेडमे गोलिया चलाई होl आज सरकारने सभी नक्सलियोंके लिए सरेंडर स्किम की घोषणा की हैl इससे सरकार का उद्देश स्पष्ट हो जाता हैl ऐसे मे अनंत नागपुरे जैसे नक्सली नेता और उनके साथीदार पोलीस की शरण मे आना यह बडी उपलब्धी मानी जानी चाहिये. सरकारकी ओरसे नक्सलीयो को समाज की मुख्यधारामे संमेलित कराने हेतू घोषित की गई योजना का लाभ अगर कोई लेना चाहता है तो उस पर आपत्ती जताना, विभिन्न सवाल उपस्थित कर ऊस प्रक्रिया को संदेह के घेरेमे लाना अनुचित माना जा रहा हैl
दुसरी और आज जो लोग हिडमाके लिए विलाप कर रहे हैं, उनसे कुछ सवाल जरूर पुछे जाने चाहिये l

क्या तुम चाहते हो कि आदिवासी गाँव जलें?
क्या तुम चाहते हो कि सेना–पुलिस में भर्ती आदिवासी जवानों की लाशें घर लौटें?
क्या तुम चाहते हो कि स्कूल-कॉलेज न बनें, सड़क-अस्पताल न बने, बच्चे अंधेरे में ही रहें?

हिडमा ने
• 76 CRPF जवानों की हत्या (2010),
• झीरम घाटी हमला (2013),
• बुरकापाल में 25 जवान शहीद (2017),
• सुकमा-बीजापुर में 22 जवान शहीद (2021),
• और कई आदिवासी ग्रामीणों की हत्या की सिर्फ इसलिए कि उन्होंने नक्सलवाद का समर्थन नहीं किया।

जो बच्चों के हाथों से किताब छीनकर बंदूक पकड़ा दे,जिसने हमारें बच्चो को शिक्षा से वंचित रखा उसे आदर्श कहना आदिवासी समाज का अपमान है। इसके अलावा और एक बात सभी ने ध्यान में रखनी चाहिए कि, भूपती एवम अन्य नक्सली नेताओके शरण आने के बाद सरकारने 15 ऑक्टोबर से 15 नोव्हेंबर इस एक महिने के बीच कोई सशस्त्र कारवाई नही की, उसका उद्देश एकही था कि, नक्सली नेताओ को शरण आने मे सुविधा होl हिडमाका एक साथीदार ईरपा भी इसी दौरान तेलंगाना सरकार को शरण आया था. बुलेट के बगर नक्सली नेताओंको शरण आने का समय उपलब्ध करा देना यही सरकार का इसके पीछे उद्देश्य थाl
परंतु हिडमा जैसे कुछ लोग अपनी जीद पर आडे रहेl शायद उसी वजहसे सरकार के सामने सशस्त्र कारवाई के अलावा दुसरा कोई चारा बाकी न रहाl जिसका नतीजा सभी के सामने हैl

हमारे आदर्श बिरसा मुंडा, टंट्या भील, भीमा नायक, रानी दुर्गावती जैसे राष्ट्र-नायक हैं,
न कि माओवादी हिडमा जैसे नक्सली के।

जो सच में आदिवासी समाज के उत्थान के लिए कार्य कर रहे ऐसे लोगों सहित समाज के ज़िम्मेदार नागरिकों का अपना पहला दायित्व है कि हमारे युवाओं को इन हिंसक, नक्सली, माओवादी विचारों के झूठे भ्रम से कैसे बचाएँ। न कि हिडमा का समर्थन करके युवा पीढ़ी को उस माओवादी विचार के लिए प्रेरित किया जाए ।