Home Artical Blog माओवादी हिंसा का अंत या नए संघर्ष की शुरुआत?

माओवादी हिंसा का अंत या नए संघर्ष की शुरुआत?

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केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah ने लोकसभा में घोषणा की कि माओवादी समस्या समाप्त हो चुकी है। दशक भर पहले जो कार्य लगभग असंभव सा लगता था, उसे संभव करने के लिए सरकार और सुरक्षा बलों को हार्दिक बधाई। उत्तर में पशुपति से लेकर दक्षिण में तिरुपति तक फैला हुआ विशाल माओवादी रेड कॉरिडोर, हजारों करोड़ की वार्षिक कमाई, गुरिल्ला युद्ध में प्रशिक्षित दस हजार से अधिक सदस्यों की एक मजबूत और अनुभवी सेना (पीएलजीए), जंगलों में सक्रिय इस बल की मदद के लिए शहरी क्षेत्रों में बनाई गई सैकड़ों फ्रंट संगठन और उनके माध्यम से काम करने वाले लाखों समर्थक इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए दस पंद्रह साल पहले यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि देश से माओवादी हिंसा का पूर्ण रूप से अंत संभव हो सकता है।

मजबूत नेतृत्व, दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और सुरक्षा बलों के अथक परिश्रम तथा अद‌वितीय साहस के कारण ही यह संभव हो पाया है। इसके लिए सभी का हृदय से अभिनंदन किया जाना चाहिए।

माओवादियों ने हजारों निर्दोष नागरिकों, सुरक्षा कर्मियों, विधायको, सांसदों, मंत्रियों और यहां तक कि गृहमंत्री तक को अपनी हिंसा का शिकार बनाया है। पिछले दो-तीन पीढियों से माओवादी प्रभावित क्षेत्रों की जनता भय के माहौल में जीवन जी रही थी, लेकिन अब वे लोग खुलकर और स्वतंत्र रूप से अपना जीवन जी सकेंगे।

आने वाले समय में माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में हिंसा पूरी तरह बंद हो जाएगी। सड़कें, पुल, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, व्यापार, उ‌द्योग, शिक्षा और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखे गए करोड़ों लोग अब विकास की ओर आगे बढ़ेंगे।

माओवादियों द्वारा की गई क्रूर हिंसा, जिसमें हजारों निर्दोष लोगों की निर्मम हत्या की गई, अब रुक गई है। लंबे समय से भय और असुरक्षा के माहौल में जीवन जी रहे लोग अब राहत महसूस करेंगे।
पिछली तीन पीढियों से लगातार भय के साये में जीवन व्यतीत कर रहे करोड़ों सामान्य नागरिक अब भयमुक्त हो रहे हैं। इसलिए राजनीतिक नेतृत्व, प्रशासनिक तंत्र और सुरक्षा बल इस उपलब्धि के लिए बधाई के पात्र हैं।

यह कहा जाता है कि 1967 के नक्सलबाड़ी हिंसा से भी पहले से लेकर आज तक माओवादियों ने आदिवासियों का केवल “उपयोग” किया है। माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष में हमेशा आदिवासियों को आगे रखा गया, जिसके कारण बडी संख्या में आदिवासी मारे गए।

अब जब गैर-आदिवासी माओवादी नेताओं पर स्वयं संकट आया, तो उन्होंने तुरंत हथियार डालकर आत्मसमर्पण कर लिया और अपनी जान बचा ली। समाज अब इस वास्तविकता को समझ चुका है। आत्मसमर्पण करने वाले इन लोगों के हाथ हजारों निर्दोष आदिवासियों के खून से सने हुए हैं यह बात समाज कभी नहीं भूलेगा।

माओवादियों दद्वारा मारे गए असंख्य लोगों के पीड़ित परिवारों को कब और किस प्रकार न्याय मिलेगा, यह आज भी एक अनुत्तरित प्रश्न बना हुआ है।

तेभागा आंदोलन, तेलंगाना आंदोलन, श्रीकाकुलम आंदोलन, गोपीबल्लभपुर आंदोलन, नक्सलबाड़ी आंदोलन, आंध्र प्रदेश में पीपुल्स वार ग्रुप (PWG), बिहार में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (MCC), और बाद में इनके विलय से बना Communist Party of India (Maoist) इस प्रकार यह साम्यवादी आंदोलन का एक लंबा क्रम रहा है।

इन हिंसक साम्यवादी आंदोलनों को समाज से समर्थन मिलने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण था। पहले जमींदारी और साहूकारी व्यवस्था प्रचलित थी। यह व्यवस्था मूल रूप से असमानता, अन्याय और शोषण पर आधारित थी। यदि किसी गांव में एक ही परिवार के पास हजारों एकड़ जमीन हो और उसी गांव के अन्य हजारों परिवार आधे पेट रहने को मजबूर हों, तो ऐसी स्थिति से असंतोष और विद्रोह उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

अंततः यही हुआ। भूखे और भूमिहीन खेतिहर मजदूरों ने जमींदारों के घरों पर हमला किया, उन्हें मार दिया और उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया। इस प्रकार की हिंसा तेजी से फैल गई।

इसी रक्तरंजित पृष्ठभूमि में तेलंगाना के पोचमपल्ली से विनोबा भावे अपनी प्रसिद्ध भूदान आंदोलन की शुरुआत की। मौत के डर से कई जमींदारों ने अपनी जमीन दान में दे दी और इस तरह अपनी जान बचाई।

सरकार ने भी भूमि सुधार कानून (सीलिंग कानून) लागू करके सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव लाने का प्रयास किया। समाज के विभिन्न वर्गों का संतुलित विकास सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी होती है। एक न्यायपूर्ण और शोषण मुक्त सामाजिक व्यवस्था का होना आवश्यक है, अन्यथा अराजकता उत्पन्न होती है।

मजदूरों की तानाशाही और पूंजीपतियों की मनमानी इन दोनों चरम सीमाओं के बीच एक “मध्यम मार्ग” निकालना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।

सभी सामाजिक वर्गों का न्यायपूर्ण और संतुलित विकास सुनिश्चित करना ही लोकतांत्रिक सरकार का कर्तव्य है। आज जब साम्यवादी (नक्सलवादी) हिंसा काफी हद तक नियंत्रण में आ चुकी है, तब यह भी आवश्यक है कि पूंजीपति वर्ग निरंकुश न हो जाए इसे सुनिश्चित करना भी सरकार का दायित्व है। शासन व्यवस्था को जन केंद्रित (people-oriented) और संवेदनशील बनाए रखते हुए जनता के कार्य किए जाएं, यह सुनिश्चित करना जरूरी है। इतिहास का अनुभव बताता है कि निर्दयी, भ्रष्ट और शोषणकारी शासन व्यवस्था ही नक्सलवाद जैसी समस्याओं को जन्म देती है इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सरकार ने माओवादियों के कब्जे वाले तथाकथित “रेड कॉरिडोर” को काफी हद तक समाप्त कर दिया है, उनके सशस्त्र ढांचे को कमजोर किया है, कई उनके वरिष्ठ नेता मारे गए हैं और कुछ आत्मसमर्पण कर चुके हैं। फिर भी यह मान लेना कि माओवाद पूरी तरह समाप्त हो गया है, और इस अनंद उत्सव में लापरवाह हो जाना उचित नहीं है।

जंगलों में चल रहा संघर्ष भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन आने वाले समय में शहरों में एक अलग प्रकार के संघर्ष की शुरुआत होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। संघर्ष ने अपना क्षेत्र बदला है- जंगलों से निकलकर अब वह “कंक्रीट के जंगल” यानी शहरी क्षेत्रों में स्थानांतरित हो सकता है।

यह समझना आवश्यक है कि माओवादी संगठन चार प्रमुख घटकों से मिलकर बना है:

1. सशक्त विचारधारा

2. संगठित राजनीतिक दल

3. सशस्त्र बल (लड़क दस्ता)

4. फ्रंट संगठनों का संयुक्त नेटवर्क

इन चार में से केवल एक घटक, यानी सशस्त्र बल, आज कमजोर हुआ है, जबकि बाकी तीन घटक अब भी सक्रिय और मौजूद हैं।

विचारधारा को जीवित बनाए रखने के लिए माओवादी अपने वरिष्ठ नेतृत्व को सुरक्षित रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। वरिष्ठ माओवादी नेता बासवराज के मारे जाने के बाद जो बड़े नेताओं के आत्मसमर्पण की लहर देखी गई, वह भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा सकती है। आत्मसमर्पण के कारण कई वरिष्ठ नेता सुरक्षित रह पाए…

माओवादी नेता आज भी जीवित हैं और सुरक्षित हैं। शहरी क्षेत्रों में सक्रिय माओवादी विचारक तो पहले से ही लगातार कार्यरत हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो माओवादी नेतृत्व को बहुत अधिक क्षति नहीं पहुँची है, ऐसा प्रतीत होता है।

वरिष्ठ नेता सुरक्षित हैं, विचारधारा जीवित है और शहरी क्षेत्रों में उनके फ्रंट संगठनों में बड़ी मात्रा में वृद्धि हुई है। जंगलों में होने वाली निरर्थक और उग्र हिंसा की सीमाओं को देखते हुए यह यह संभावना नकारा नहीं जा सकती कि माओवादी अब शहरी क्षेत्रों में संघर्ष खड़ा करने ही प्रयास करेंगे ।

शहरी गतिविधियों के संबंध में माओवादी दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि समाज के विभिन्न वर्गों में संगठन खड़े किए जाने चाहिए। इन फ्रंट संगठनों का माओवादी दल से खुला संबंध नहीं दिखना चाहिए, बल्कि गुप्त रूप से संपर्क बनाए रखते हुए ये संगठन माओवादी गतिविधियों को सहयोग दें।

समाज के सभी वर्गों में ऐसे फ्रंट संगठन बनाकर बड़ी संख्या में लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ना शहरी माओवादी कार्य का हिस्सा बताया गया है। “जन संगठन” (Mass Organisation) और “जन आंदोलन” (Mass Struggle)

जैसे शब्द इस संदर्भ में बार-बार उपयोग किए जाते हैं। एक बार ये संगठन स्थापित हो जाएँ, तो फिर अवसर देखकर विभिन्न स्थानों पर आंदोलन खड़े करना और सरकार पर तर्क हीन दबाव बनाना उनका उ‌द्देश्य होता है।

ऐसे आंदोलनों के प्रभाव और जटिलता का अनुभव हाल के वर्षों में सामने आये विभिन्न बड़े जन आंदोलनों के दौरान देखा गया है।

ऐसे आंदोलनों में उमड़ने वाली विशाल जनसंख्या के सामने राजनीतिक नेतृत्व और सुरक्षा तंत्र किस प्रकार असहाय हो जाते हैं, इस प्रकार की स्थिति से हम सभी परिचित हैं। जब आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी यह कहते हैं कि उन्होंने हथियारों का त्याग कर दिया है और अब वे जनता की समस्याओं को संविधान के माध्यम से हल करने का प्रयास करेंगे, तो वि‌द्वानों इसके निहितार्थ जानते हैं। यह आशंका व्यक्त की जाती है कि निकट भविष्य में कुछ तत्व भारतीय संविधान का उपयोग अपने उ‌द्देश्यों के लिए एक साधन के रूप में कर सकते हैं। इसलिए इस विषय में सतर्क रहना आवश्यक हो जाता है।

शहरी क्षेत्रों में सक्रिय ऐसे समूह अक्सर अलग-अलग सामाजिक भूमिकाओं में दिखाई दे सकते हैं और समाज में प्रभाव बनाने की कोशिश करते हैं। वन क्षेत्रों में हिंसक संघर्ष कम होने के बाद, शहरी क्षेत्रों में वैचारिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर नए प्रकार के संघर्ष की सम्भावनाओ की चर्चा तेज हो गई है।

इसी संदर्भ में सभी राजनीतिक दलों के नेताओं, सुरक्षा एजेंसियों, मीडिया से जुड़े वि‌द्वानों और समाज के विभिन्न नेतृत्वकर्ताओं को सतर्क, जिम्मेदार और संवेदनशील रहने की अवश्यकता है।

लेखक :- मिलिंद महाजन, नागपूर